गोवर्द्धन पूजा की आज देशभर में धूम, जानें गोवर्धन पूजा की कथा
गोवर्द्धन पूजा की आज देशभर में धूम, जानें गोवर्धन पूजा की कथा
09, Nov 2018,11:11 AM
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आज पूरे देशभर में गोवर्धन पूजा  की की धूम है. दरअसल, दीपावली यानी दिवाली  के अगले दिन गोवर्द्धन पूजा (Govardhan Puja) की जाती है. गोवर्दन पूजा के दिन भगवान कृष्‍ण , गोवर्द्धन पर्वत और गायों की पूजा का विधान है, पकवान बनाकर श्रीकृष्‍ण को उनका भोग लगाया जाता है.  इन पकवानों को 'अन्‍नकूट' कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि ब्रजवासियों की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से विशाल गोवर्धन पर्वत को छोटी अंगुली में उठाकर हजारों जीव-जतुंओं और इंसानी जिंदगियों को भगवान इंद्र के कोप से बचाया था. यानी भगवान कृष्‍ण ने देव राज इन्‍द्र के घमंड को चूर-चूर कर गोवर्द्धन पर्वत की पूजा की थी. गोवर्धन पूजा कार्तिक माह की प्रतिपदा को मनाया जाता है. इस खास दिन लोग अपने घरों में गाय के गोबर से गोवर्धन बनाते हैं. 


मान्यता है कि इस दिन जो भी श्रद्धापूर्वक भगवान गोवर्धन की पूजा करता है, उसे सुख समृद्धि प्राप्त होती है. तो चलिए जानते हैं कि इस पूजा की आखिर कथा क्या है?
गोवर्द्धन पूजा की कथा


पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपने सखा और गोप-ग्वालों के साथ गाय चराते हुए गोवर्धन पर्वत जा पहुंचे. वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि गोपियां 56 (छप्पन) प्रकार के भोजन रखकर बड़े उत्साह से नाच-गाकर उत्सव मना रही थीं. पूरे ब्रज में भी तरह-तरह के मिष्ठान्न और पकवान बनाए जा रहे थे. श्रीकृष्ण ने इस उत्सव का प्रयोजन पूछा तो गोपियां बोली-'आज तो घर-घर में यह उत्सव हो रहा होगा, क्योंकि आज वृत्रासुर को मारने वाले मेघ देवता देवराज इन्द्र का पूजन होगा. यदि वे प्रसन्न हो जाएं तो ब्रज में वर्षा होती है, अन्न पैदा होता है, ब्रजवासियों का भरण-पोषण होता है, गायों का चारा मिलता है .'
श्रीकृष्ण बोले, 'इन्द्र में क्या शक्ति है, जो पानी बरसा कर हमारी सहायता करेगा? उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा यह गोवर्धन पर्वत है. इसी के कारण वर्षा होती है. अत: हमें इन्द्र से भी बलवान गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए.' इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण के वाक-जाल में फंसकर ब्रज में इन्द्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा की तैयारियां शुरू हो गईं. सभी गोप-ग्वाल अपने-अपने घरों से सुमधुर, मिष्ठान्न पकवान लाकर गोवर्धन की तलहटी में श्रीकृष्ण द्वारा बताई विधि से गोवर्धन पूजा करने लगे.


 गोवर्धन की पूजा देखकर नारद मुनि ने ब्रजवासियों से पूछा तो उन्होंने बताया, 'श्रीकृष्ण के आदेश से इस वर्ष इन्द्र महोत्सव के स्थान पर गोवर्धन पूजा की जा रही है.' यह सुनते ही नारद उल्टे पांव इन्द्रलोक पहुंचे और उदास तथा खिन्न होकर बोले-'हे राजन! तुम महलों में सुख की नींद सो रहे हो, उधर गोकुल के निवासी गोपों ने इद्रोज बंद करके आप से बलवान गोवर्धन की पूजा शुरू कर दी है. आज से यज्ञों आदि में उसका भाग तो हो ही गया. यह भी हो सकता है कि किसी दिन श्रीकृष्ण की प्रेरणा से वे तुम्हारे राज्य पर आक्रमण करके इन्द्रासन पर भी अधिकार कर लें.


नारद तो अपना काम करके चले गए. अब इन्द्र क्रोध में लाल-पीले हो गए. ऐसा लगता था, जैसे उनके तन-बदन में अग्नि ने प्रवेश कर लिया हो.पर्वताकार प्रलयंकारी मेघ ब्रजभूमि पर जाकर मूसलाधार बरसने लगे. कुछ ही पलों में ऐसा दृश्य उत्पन्न हो गया कि सभी बाल-ग्वाल भयभीत हो उठे. भयानक वर्षा देखकर ब्रजमंडल घबरा गया. सभी ब्रजवासी श्रीकृष्ण की शरण में जाकर बोले, 'भगवन! इन्द्र हमारी नगरी को डुबाना चाहता है, आप हमारी रक्षा कीजिए.'


फिर श्री कृष्ण ने अपने गोखुल वासियों को अपने साथ चलने को कहा और गोवर्धन पर्वत को अपने छोटी सी ऊँगली पे उठा कर सबको सरन दिलाई इस तरह सभी गोखुल वासी श्री कृष्ण की महिमा की जय जय करने लगे और इंद्र भगवन का घमंड टूट  गया उसी दिन से गोवर्धन पर्वत को लोग पूजने लगे.

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